बूढ़े बाप और दिव्यांग मां को बेटों ने किया घर से बाहर, बाप ने 15 वर्ष के बाद ऐसे सिखाया सबक...!

इस संसार के  बदलते रहन – सहन यदि शुद्ध सीधी बात में  कहुँ तो तौर तरीके बदलते हुए देखकर खुशी भी होती है। कि लोग  नए तरीके से ज़िन्दगी जीते है। कोई हर्ज़ नहीं है नयी ढंग से ज़िन्दगी जीने में पर दुःख होता है। जब इस नए तरीके कि ज़िन्दगी में लोग माँ – बाप को भूल जाते है। 
अलग कर देते है आखिर क्यों, ये सवाल मेरा नहीं है ये सवाल उन सभी बुढे माँ – बाप पूछ रहे है कि उनका कसूर क्या है। जो कि इस बुढ़ापे में उनको अलग कर दिया गया है। क्या उनका कसूर सिर्फ  इतना है कि उन्होंने बच्चों को पाल – पॉश के बड़ा किया उनको बचपन में हर चीज़ दी हर सुख दिया। किसी चीज़ कि कोई कमी न हो इसलिए खुद कि मेहनत के पैसे बचा के रखा ताकि बच्चों को भविष्ये में कोई कमी न हो।

शायद यही उनका कसूर था उन बूढ़े माँ – बाप का  जिसकी सज़ा उनको आज दी जा रही है। खुद का घर होते हुए भी वृद्धा आश्रम में रहना पड़ता है। आज हम आपको एक ऐसा ही मामला बताने जा रहे है जो की छत्तीसगढ़ से सामने आया है। तो आइये जानते है क्या है पूरा मामला।
छत्तीसगढ़ में पांच कलियुगी बेटों ने अपने 86 वर्ष के पिता और दिव्यांग मां के साथ जो किया। उसे पढ़कर आपकी आंखें नम हो जाएंगी। लेकिन ज़िंदगी के इस पड़ाव पर आकर जब इन बुजुर्गों को सहारे की आवश्यक थी। तब ये एक झोपड़ी में दिन काटने को मजबूर थे। सर्दी हो या गर्मी अथवा बरसात, हर मौसम में ये अपनी औलाद की राह देखते रहते थे कि कभी तो इनको झोपड़ी से पक्के घर में ले जाएंगे। लेकिन बेटों का दिल नहीं पसीजा।

अब देश का कानून इन बुजुर्गों का मददगार बना तो बेटों के होश उड़ गए। यहां के चिखली चौक निवासी हीरालाल साहू अपनी पत्नी के साथ पिछले करीब 15 वर्ष से झोपड़ी में रहने को मजबूर थे। बुढ़ापे में भी बेटों सुमरन लाल, हुकूम साहू, प्रमोद साहू, उमाशंकर और कीर्तन साहू ने सुध नहीं ली। इन्होंने पिता की भुमि पर मकान बनाया और उसके ​बाद उन्हें ही बेदखल कर दिया। अब पुलिस ने पांचों बेटों को गिरफ्तार किया तो हलचल मच गया। हीरालाल की बहुओं ने इसके लिए माफी मांगी है।

बेटों ने नहीं सुनीं मिन्नतें
गौरतलब है की हीरालाल ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा सरकारी प्रेस में नौकरी करते हुए बिताया और उन्होंने यही आस रखी थी की वे अपनी कमाई से बचत किये गये पैसों  से अपने बच्चो का भविष्य संवारेंगे और बुढ़ापे में यही बच्चे उनका सहारा बनेंगे। जिससे उनका जीवन शांति से कटेगा। लेकिन  उनके बेटों ने उनके सोच के बिल्कुल ही विपरीत काम किया और  बेटों ने उनके ही  भुमि पर अपने लिए तो आशियाना बना लिया, पर  बुढ़ापे में जब  मां—बाप को  सहारे की सबसे अधिक आवश्यक थी। तब उन्होंने माँ बाप को  घर से बाहर का  रास्ता  दिखा दिया। मजबूरन हीरालाल पिछले डेढ़ दशक से एक झोपड़ी में दिन बिता रहे थे। वे बेटों से मिन्नतें करते रहे कि उन्हें घर में रहने दें। इसके बावजूद बेटे अपनी दुनिया में मग्न रहे और मां-बाप को लगातार नजरअंदाज करते रहे।

जब इस तरह से हीरालाल काफी व अधिक परेशान हो गये और  वो पूरी तरह से बेबस हो गये तब आखिर में हीरालाल ने हौसला बटोरा और चिखली पुलिस में वरिष्ठ नागरिक सुरक्षा अधिनियम 2007 की धारा 24 के अंतर्गत बेटों के विरुद्ध मामला दर्ज करा दिया। इसके बाद पुलिस ने चार बेटों को गिरफ्तार कर लिया। वहीं भोपाल निवासी बेटे के विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। परन्तु बेटों को जमानत मिल गई है। लेकिन इससे उनके रवैए में तब्दीली आई है। पहले जहां वे मां-बाप की सुध तक नहीं लेते थे अब उन्हें घर ले जाने की बात कर रहे हैं।

आर्थिक रूप से सक्षम परिवार

आपको जानकर परेसानी होगी की जिस बेटों ने अपने बुजुर्ग- माँ बाप के साथ ऐसा शर्मनाक कांड किया वे कोई अनपढ़ या आर्थिक रूप से कमजोर नहीं थे। बल्कि  हीरालाल का सबसे बड़ा बेटा सुमरन सरकारी प्रेस में नौकरी करता था। जो अब सेवानिवृत्त हो चुका है। अन्य बेटे निजी संस्थानों में नौकरी करते हैं। परिवार आर्थिक रूप से सक्षम है। फिर भी बुजुर्ग मां-बाप की अनदेखी करते रहे। वहीं, उपेक्षा और तकलीफ में ज़िंदगी के दिन गुजार रहे हीरालाल ने जब केरल में भीषण बाढ़ की खबर पढ़ी तो अपनी बचत से 70 हजार रुपए प्रशासन को दान कर दिए थे।

ऐसे में कहा जा सकता है की हीरालाल का परिवार आर्थिक रूप से काफी सक्षम है फिर भी अपने ईश्वर सामान माता पिता का देखभाल करने में पूरी तरह से असक्षम है। जो बेहद शर्मनाक है। वही इस मामले पर प्रशासन ने कहा है कि बुजुर्गों को उनका कानूनी हक मिलेगा। अधिकारियों ने ऐसी घटनाओं पर चिंता जताई है। साथ ही नौजवानों को नसीहत दी है कि माता-पिता हमारी सबसे बड़ी संपत्ति हैं। इनका सम्मान करें।